शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

सेवानिवृत्ति

आज एक अधिकारी की सेवानिवृत्ति के अवसर पर आयोजित एक विदाई समारोह का संचालन करते हुए ये कुछ पंक्तियाँ मैंने पढ़ीं थीं। तात्कालिक रूप से जो विचार मन में आए उन्हें बस शब्दों में उतार दिया-

                                सेवानिवृत्ति नहीं है जीवन में निष्क्रिय हो जाना
                         कार्यक्षेत्र ही बदलता है न तुम शिथिल हो जाना
                         पाया है तुमने इस  समाज से अब तक  जितना
                         बन कर वरिष्ठ नागरिक  समाज को है लौटाना

                         चालीस बरस पहले आए थे नौसिखिया बन कर
                         जा रहे हो आज विभाग के एक विशेषज्ञ बन कर
                         विभाग को जो दिया उससे अधिक तो पाया होगा
                         उसी हासिल में से कुछ दे जाओ युवाओं को अगर 
                         उतर जाएगा ऋण, मन भी कुछ हलका हो जाएगा
                         प्रतिभाओं को तराशने का सिलसिला चल जाएगा

                         अनुभव खट्टे-मीठे सभी इस दौरान मिले ही होंगे
                          सोचना दुख तमाम मिले थे अपनी  बदनसीबी से 
                          खुशियों के फूल खिले साथियों की खुशनसीबी से
                          इस मूल मंत्र से ही ये अनुभव सदा यादगार बनेंगे

                          तनको काम की और मनको विचार की आदत
                          जो बनी है उसे बनाए रखना, सक्रिय बने रहना
                          संकट की हर घड़ी में याद हमें सदा करते रहना 
                          भावी जीवन में खुश और स्वस्थ सदा बने रहना 

                          कार्यालय से कर रहे हैं विदा मगर दिल से न जाना
                          जरूरत जब पड़े, याद जब भी आए तुरंत चले आना
     

बुधवार, 28 जनवरी 2015

वही तो पाएगा जो बोया है

वही तो पाएगा जो बोया है  - विनोद शर्मा ‘व्याकुल’


जिंदगी आसान तो कभी न थी,
मगर इतनी  दुश्वार भी न थी।
बचपन बेशक अभावों में बीता,
संस्कार मगर हरदम ही जीता।
अपना पेट काट कर हमें पालते,
माता-पिता को देखा हमें चाहते।
उनके बुढ़ापे में बारी अपनी आई,
जी भर सेवा की और दुआ पाई।
आजके नौजवान ये क्या करते हैं,
माँ-बाप को जो बोझ समझते हैं।
इस कदर बचकानी दलील देते हैं,
समय नहीं है कहके मुँह छुपाते हैं।
भूल गए माँ ने वह पीड़ा सही थी,
सह न सका आज तक नर कभी।
गीले में सोई उसे सूखे में सुलाया,
भूखी रह कर उसे सदा खिलाया।
आज उपेक्षित पड़ी है एक कोने में,
दिन कटता है सिसकने में रोने में।
सिखाया था चलना, खाना, बोलना,
पिता के बस में नहीं मुँह खोलना।
नराधम को नहीं पता क्या खोया है,
‘व्याकुल’ वही तो पाएगा जो बोया है।

बुढ़ापा एक बदनसीबी

बुढ़ापा एक बदनसीबी
-          विनोद शर्मा ‘व्याकुल’
चंचल बचपन और अल्हड़ जवानी
कब कैसे गुजर गए कुछ याद नहीं,
खप गई अधेड़ावस्था घर चलाने में।
लगा दिन रात पाई पाई जुटाने में,
पैर हमेशा चादर से बाहर रहते थे।
न खुद का होश था न फुरसत थी,
बच्चे कुछ बन जाएँ ये हसरत थी।
फर्ज तमाम बखूबी निभाए गए थे,
बच्चे भी अच्छे ओहदे पा गए थे।
बुढ़ापा ये नामुराद जब से आया है,
उपेक्षा के बियाबान में दर्द साया है।
उंगली पकड़ चलना सिखाया जिनको,
वही आज उँगली दिखाते हैं मुझको।
कितना कष्ट सहा उनके सुख के लिए,
मेरी तकलीफें बनी बहाना उनके लिए।
पहुँचाया था स्कूल कांधे पर बिठा कर
पटक दिया गया हूँ कोने में उठा कर।
फ्रेम में जड़ी तसवीर बन रह गया हूँ,
पाला था सबको मोहताज बन गया हूँ।
इस बूढ़े की किसी को जरूरत नहीं है,
हाल जानने की उन्हें फुरसत नहीं है।
कबाड़खाने में टूटे फर्नीचर सा पड़ा हूँ,
काँटा बनके सब की नज़र में गड़ा हूँ।
आता है ये बुढ़ापा बदनसीबी बन कर,
जिंदगी हुई मुहाल ‘व्याकुल’ बूढ़ा हो कर।
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रविवार, 26 अक्टूबर 2014

अश्कों के बहाने

तेरी चाहत के नगमे और तराने लिखूँगा

रिफ़ाकत में जुदाई के अफ़साने लिखूँगा




मुझे मालूम है अपनी चाहत का अंजाम

जिद है कि ये जिंद नाम तुम्हारे लिखूँगा


माना के तू है फलक का रोशन माहताब 

उल्फ़त मे तेरी दिनोरात अपने लिखूँगा


शिद्दत मेरी चाहत की तू जान ले आज

दीवान-ए-चाहत खूं से मैं अपने लिखूँगा



दरमियां हमारे फ़ासले इतने हो गए आज

ताउम्र नाकामी के अपनी फसाने लिखूँगा



बेइंतिहा चाहा है तुझे इसी बहाने लिखूँगा


‘व्याकुल’ है मन अश्कों के बहाने लिखूँगा

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

व्यक्ति-पूजा

बहुत अनुभव तो नहीं है लेकिन पठन-पाठन के लगभग 40 वर्ष के अनुभव और परिवेश के प्रेक्षण से यह निष्कर्ष निकाल पाया हूँ कि हम भारतवासी कहीं न कहीं चरमवादी और उपासक हैं। हो सकता है कि इसका कारण यह हो कि हमें आदर्शों की घुट्टी कुछ ज्यादा ही पिलाई जाती हो या फिर हमारे अंदर हीन-भावना अधिक हो।  हम लोग किसी व्यक्ति की महानता का आकलन कभी भी व्यावहारिक पैमाने पर नहीं करते। यदि हम किसी को महान कहते हैं तो फिर उसे इस धरती के एक सामान्य मनुष्य की स्थिति से उठा कर एक आदर्श व्यक्ति की काल्पनिक छवि प्रदान कर देते हैं। इस कार्य में हमारे समाज के सभी लोग शामिल हैं, सामान्य जन के साथ-साथ बुद्धिजीवी भी व्यक्ति-पूजा में पीछे नहीं रहते। काल्पनिक आदर्श छवि प्रदान करने के बाद, यथार्थ से नाता तोड़ कर, हमारा हर प्रयास उस व्यक्ति को एक सर्वगुणसंपन्न, आदर्श व्यक्ति साबित करने के लिए किया जाता है। इस देश के अनेक महापुरुष व्यक्ति-पूजा के शिकार हो चुके हैं। हमारे बीच से यदि कोई ऐसा व्यक्ति निकलता है जो किसी बात में हम से बेहतर या श्रेष्ठतर है, तो हम यह अपेक्षा क्यों करते हैं कि वह सभी बातों में सब लोगों से श्रेष्ठतर होगा। इस देश के सर्वाधिक ख्यातिप्राप्त वैश्विक व्यक्तित्व, महात्मा गांधी को भी इसका शिकार होना पड़ा। मूल रूप से वे एक इंसान थे, उनमें कुछ चीजें आम लोगों की तुलना में श्रेष्ठतर थीं, उनकी कुछ विशएषताएं थी जिनके कारण उनको दुनिया भर में प्रसिद्धि मिली। अब लोगों ने उन्हें आदर्शों के सिंहासन पर बिठा दिया। यदि मानव के रूप में जन्म लिया है तो उसमें मानवीय कमजोरियाँ भी तो होंगी। आदर्शों के सिंहासन पर हठात बिठाए गए महात्मा गांधी की प्रचारित विशेषताओं और गुणों से इतर उनके सामान्य मानवीय व्यवहार या प्रवृत्तियों (जिन्हें एक वर्ग द्वारा अनायास या जानबूझ कर छुपाया गया था) को लेकर जब-तब उनके चरित्र-हनन का प्रयास किया जाता रहा है। सार्वजनिक जीवन व्यतीत करने वाली अनेक हस्तियों को हमारी इस प्रवृत्ति के कारण अप्रिय स्थिति का अपने जीवन में या मरणोपरांत सामना करना पड़ा है। नेहरू, इंदिरा, राजीव, सोनिया, अंबेडकर, पटेल, शास्त्रीजी, अटलजी जैसे नेताओं की लंबी सूची है जिन्हें जननायक के रूप में महिमा-मंडित कर दिया गया और उनके मानवीय पहलुओं को लेकर बाद में आलोचनाएं की गईं। सबसे ताजा उदाहरण हमारे प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी का है। हम लोग भक्ति करते हैं तो चरम स्तर की, एक मानव को उठाकर इतने ऊँचे सिंहासन पर आरूढ़ कर देते हैं कि बाद में उस व्यक्ति के किसी भी सहज मानवीय कृत्य या व्यवहार के लिए उसकी आलोचना करने का अवसर जिस-तिस को मिल जाता है। हम व्ययावहारिक दृष्टिकोण क्यों नहीं अपनाते? विकसित देशों में ऐसा नहीं है। वे लोग अधिक व्यावहारिक हैं, वहाँ इंसान को भगवान नहीं बनाया जाता। दूसरा उदाहरण तमिलनाडु में जयललिता का देखा जा सकता है जिनके जेल जाने के बाद उनके अनुयायियों द्वारा निरंतर विरोध-प्रदर्शन किए जा रहे हैं। लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि व्यक्ति-पूजा का खामियाजा अंत-पर्यंत उस पूजित व्यक्ति को ही भुगतना पड़ता है।  

सोमवार, 21 जुलाई 2014

चंचल मन

हाइकू – विनोद शर्मा “व्याकुल”
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चंचल मन
उड़ना चाहता है
दूर गगन

मन मयूर
नाचना चाहता है
हो के मगन

देखा तुझे तो
अटकी रह गई
मेरी नजर

तेरे रूप का
जलवा है आँखों में
हर समय

उड़ी दी नींदें
छीन लिया है चैन
दिन बेचैन

होगा मिलन
एक दिन हमारा
मुझे यकीन


बुधवार, 16 जुलाई 2014

एक सौदागर ऐसा आया देश में


एक सौदागर ऐसा आया देश में
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एक सौदागर ऐसा आया देश में
सपने सुहाने ले कर आया देश में
सुंदर ऐसा जाल बिछाया देश में
मदहोश सबको कर दिया देश में
जो मांगा उसने वो पाया देश में
वादों से सबको भरमाया देश में
मीठी बातों में हरेक आया देश में
उसने कैसा ये खेल रचाया देश में
आशाओं को उसने जगाया देश में
जमे हुए तख्त को हिलाया देश में
कब्जा यूँ तख्त पर जमाया देश में
और फिर वादों को भुलाया देश में
दामों को बाजार के बढ़ाया देश में
ये कैसा हाहाकार मचाया देश में
एक सौदागर ऐसा आया देश में