सोमवार, 4 मई 2015

आदमी अकेला हो गया है

आदमी अकेला हो गया है - विनोद शर्मा ‘व्याकुल’
--------------------------------------------------
कंक्रीट के जंगल में
धुआं उगलते
वाहनों की रेलमपेल में
बेतहाशा दौड़ते
सिटी बसों में लटकते
इधर-उधर भटकते
नौकरी की तलाश में
रोटी के जुगाड़ में
आदमी अकेला हो गया है
शायद खो गया है
उसका होना या न होना
कतई अहम नहीं रहा
उद्देश्य जीने का नहीं रहा
बेकारी और लाचारी
साथी बने हैं
निराशा को घना कर रहे हैं
आखिर कहाँ जाए
क्या करे
आदमी अकेला हो गया है

अपने पराए

इस दुनिया की रीत निराली, अपने पराए हो जाएँ

वक्त आने पर अपने भी साथ छोड़ के दूर हो जाएँ


स्वार्थ पर टिके हैं रिश्ते यहाँ मतलब के सब साथी


कोई मतलब न रहे तो भाई भी अजनबी बन जाएँ


हजार भलाई भी बेकार यदि एक बार मदद नहीं की


फूल जाते हैं मुँह लोगों के उपकार सारे हवा हो जाएँ


विपदा में बन जाते हैं तमाशाई खड़े तमाशा है देखें


पीड़ित चाहे जितना चिल्लाए पर बहरे ये बन जाएँ


‘व्याकुल’ भरोसा नहीं किसी का सब रंग बदलते हैं


वादा तो कर लेंगे ये पता नहीं वक्त पड़े पलट जाएँ


-विनोद शर्मा ‘व्याकुल’

इंसान की कदर कोई नहीं

पैसे के दौर में इंसान की कदर कोई नहीं

पैसेका रौब चले ईमान की बात कोई नहीं

 
पैसा बना भगवान चाहे जिस विध ये आए


है काला या सफेद इसकी परवाह कोई नहीं


पैसे के पीछे रिश्ते सब जमाने में खो गए


भाई बना दुश्मन रिश्ते का मान कोई नहीं

बिना पढ़ाई मिलें पैसे से नौकरियाँ और हो

उच्च शिक्षा में प्रवेश. चाहे प्रतिभा कोई नहीं

पैसे से बनें भाग्यविधाता, जनता के रखवाले

पैसा ही जिताए चुनाव वोट का मोल कोई नहीं

पैसे से इंसाफ मिले गरीब दर-दर ठोकर खाए

इंसाफ बिकता यहाँ कानून की कद्र कोई नहीं

-विनोद शर्मा ‘व्याकुल’

आओ करें तदबीर नई

छोड़ कर मायूसी को आओ करें तदबीर नई

वक्त के कागज़ पर आओ लिखें तहरीर नई


खुद कुछ नहीं होगा करने से सूरत बदलेगी


हाथों में अपने ब्रश उठालो बनाएं तस्वीर नई


अमन चैन तभी लौटेगा जब नफरत मिटेगी


दिलों से मैल निकालो आओ करें तक़रीर नई


कठमुल्लाओं से निजात पाओ कौम आगे बढ़े


आजाद बंदिशों से हो जाओ चलाएँ तहरीक नई


कैसे भी इबादत करो मजहब रुकवट नहीं बने


‘व्याकुल’ हिंदुस्तान की लो बनाएं तकदीर नई

निगाहों से यूँ कत्ल करने वाले

निगाहों से यूँ कत्ल करने वाले

जालिम बड़े हैं ये तड़पाने वाले


गुमां नहीं होता दिल खोने का


जादूगर होते हैं दिल चुराने वाले


मीठी बातों से मन को लुभाते हैं

दिल पर फिर छुरी चलाने वाले 


सपने इस कदर रंगीन दिखाते हैं


हो जाते गुलाम दिल लुटाने वाले


इन हसीनों से अब कौन बचाए 


बेदर्द बड़े हैं बिजली गिराने वाले

कोई रास्ता नहीं बचा है ‘व्याकुल’


बेहतर यही है हो जा इनके हवाले


-विनोद शर्मा ‘व्याकुल’

आहार भी जरूरी है - नेपाल त्रासदी

चतुर्दिश है करुण रुदन, क्रंदन और चीत्कार

वसुधा की पीड़ा फूटी, मचा सब ओर हाहाकार


आश्रय जो सिर पर था, आन पड़ा भरभरा कर


अनगिनत मासूम पड़े, प्रस्तर खंडों में दब कर


बच गए विभीषिका से बैठे हुए हैं खुले मैदान में


दिवस तीसरा हो गया, अन्न जल के इंतजार में


प्रशासन तंत्र व्यस्त है, किसी विध बचाएँ जान


ये न हो विभीषिका से बचे भूख से त्याग दें प्राण


अगर भग्नावशेषों में दबे लोगों की रक्षा जरूरी है


तो रक्षितों के जीवन के लिए आहार भी जरूरी है


- विनोद शर्मा 'व्याकुल'

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

सेवानिवृत्ति

आज एक अधिकारी की सेवानिवृत्ति के अवसर पर आयोजित एक विदाई समारोह का संचालन करते हुए ये कुछ पंक्तियाँ मैंने पढ़ीं थीं। तात्कालिक रूप से जो विचार मन में आए उन्हें बस शब्दों में उतार दिया-

                                सेवानिवृत्ति नहीं है जीवन में निष्क्रिय हो जाना
                         कार्यक्षेत्र ही बदलता है न तुम शिथिल हो जाना
                         पाया है तुमने इस  समाज से अब तक  जितना
                         बन कर वरिष्ठ नागरिक  समाज को है लौटाना

                         चालीस बरस पहले आए थे नौसिखिया बन कर
                         जा रहे हो आज विभाग के एक विशेषज्ञ बन कर
                         विभाग को जो दिया उससे अधिक तो पाया होगा
                         उसी हासिल में से कुछ दे जाओ युवाओं को अगर 
                         उतर जाएगा ऋण, मन भी कुछ हलका हो जाएगा
                         प्रतिभाओं को तराशने का सिलसिला चल जाएगा

                         अनुभव खट्टे-मीठे सभी इस दौरान मिले ही होंगे
                          सोचना दुख तमाम मिले थे अपनी  बदनसीबी से 
                          खुशियों के फूल खिले साथियों की खुशनसीबी से
                          इस मूल मंत्र से ही ये अनुभव सदा यादगार बनेंगे

                          तनको काम की और मनको विचार की आदत
                          जो बनी है उसे बनाए रखना, सक्रिय बने रहना
                          संकट की हर घड़ी में याद हमें सदा करते रहना 
                          भावी जीवन में खुश और स्वस्थ सदा बने रहना 

                          कार्यालय से कर रहे हैं विदा मगर दिल से न जाना
                          जरूरत जब पड़े, याद जब भी आए तुरंत चले आना