सोमवार, 4 मई 2015

इंसान की कदर कोई नहीं

पैसे के दौर में इंसान की कदर कोई नहीं

पैसेका रौब चले ईमान की बात कोई नहीं

 
पैसा बना भगवान चाहे जिस विध ये आए


है काला या सफेद इसकी परवाह कोई नहीं


पैसे के पीछे रिश्ते सब जमाने में खो गए


भाई बना दुश्मन रिश्ते का मान कोई नहीं

बिना पढ़ाई मिलें पैसे से नौकरियाँ और हो

उच्च शिक्षा में प्रवेश. चाहे प्रतिभा कोई नहीं

पैसे से बनें भाग्यविधाता, जनता के रखवाले

पैसा ही जिताए चुनाव वोट का मोल कोई नहीं

पैसे से इंसाफ मिले गरीब दर-दर ठोकर खाए

इंसाफ बिकता यहाँ कानून की कद्र कोई नहीं

-विनोद शर्मा ‘व्याकुल’

आओ करें तदबीर नई

छोड़ कर मायूसी को आओ करें तदबीर नई

वक्त के कागज़ पर आओ लिखें तहरीर नई


खुद कुछ नहीं होगा करने से सूरत बदलेगी


हाथों में अपने ब्रश उठालो बनाएं तस्वीर नई


अमन चैन तभी लौटेगा जब नफरत मिटेगी


दिलों से मैल निकालो आओ करें तक़रीर नई


कठमुल्लाओं से निजात पाओ कौम आगे बढ़े


आजाद बंदिशों से हो जाओ चलाएँ तहरीक नई


कैसे भी इबादत करो मजहब रुकवट नहीं बने


‘व्याकुल’ हिंदुस्तान की लो बनाएं तकदीर नई

निगाहों से यूँ कत्ल करने वाले

निगाहों से यूँ कत्ल करने वाले

जालिम बड़े हैं ये तड़पाने वाले


गुमां नहीं होता दिल खोने का


जादूगर होते हैं दिल चुराने वाले


मीठी बातों से मन को लुभाते हैं

दिल पर फिर छुरी चलाने वाले 


सपने इस कदर रंगीन दिखाते हैं


हो जाते गुलाम दिल लुटाने वाले


इन हसीनों से अब कौन बचाए 


बेदर्द बड़े हैं बिजली गिराने वाले

कोई रास्ता नहीं बचा है ‘व्याकुल’


बेहतर यही है हो जा इनके हवाले


-विनोद शर्मा ‘व्याकुल’

आहार भी जरूरी है - नेपाल त्रासदी

चतुर्दिश है करुण रुदन, क्रंदन और चीत्कार

वसुधा की पीड़ा फूटी, मचा सब ओर हाहाकार


आश्रय जो सिर पर था, आन पड़ा भरभरा कर


अनगिनत मासूम पड़े, प्रस्तर खंडों में दब कर


बच गए विभीषिका से बैठे हुए हैं खुले मैदान में


दिवस तीसरा हो गया, अन्न जल के इंतजार में


प्रशासन तंत्र व्यस्त है, किसी विध बचाएँ जान


ये न हो विभीषिका से बचे भूख से त्याग दें प्राण


अगर भग्नावशेषों में दबे लोगों की रक्षा जरूरी है


तो रक्षितों के जीवन के लिए आहार भी जरूरी है


- विनोद शर्मा 'व्याकुल'

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

सेवानिवृत्ति

आज एक अधिकारी की सेवानिवृत्ति के अवसर पर आयोजित एक विदाई समारोह का संचालन करते हुए ये कुछ पंक्तियाँ मैंने पढ़ीं थीं। तात्कालिक रूप से जो विचार मन में आए उन्हें बस शब्दों में उतार दिया-

                                सेवानिवृत्ति नहीं है जीवन में निष्क्रिय हो जाना
                         कार्यक्षेत्र ही बदलता है न तुम शिथिल हो जाना
                         पाया है तुमने इस  समाज से अब तक  जितना
                         बन कर वरिष्ठ नागरिक  समाज को है लौटाना

                         चालीस बरस पहले आए थे नौसिखिया बन कर
                         जा रहे हो आज विभाग के एक विशेषज्ञ बन कर
                         विभाग को जो दिया उससे अधिक तो पाया होगा
                         उसी हासिल में से कुछ दे जाओ युवाओं को अगर 
                         उतर जाएगा ऋण, मन भी कुछ हलका हो जाएगा
                         प्रतिभाओं को तराशने का सिलसिला चल जाएगा

                         अनुभव खट्टे-मीठे सभी इस दौरान मिले ही होंगे
                          सोचना दुख तमाम मिले थे अपनी  बदनसीबी से 
                          खुशियों के फूल खिले साथियों की खुशनसीबी से
                          इस मूल मंत्र से ही ये अनुभव सदा यादगार बनेंगे

                          तनको काम की और मनको विचार की आदत
                          जो बनी है उसे बनाए रखना, सक्रिय बने रहना
                          संकट की हर घड़ी में याद हमें सदा करते रहना 
                          भावी जीवन में खुश और स्वस्थ सदा बने रहना 

                          कार्यालय से कर रहे हैं विदा मगर दिल से न जाना
                          जरूरत जब पड़े, याद जब भी आए तुरंत चले आना
     

बुधवार, 28 जनवरी 2015

वही तो पाएगा जो बोया है

वही तो पाएगा जो बोया है  - विनोद शर्मा ‘व्याकुल’


जिंदगी आसान तो कभी न थी,
मगर इतनी  दुश्वार भी न थी।
बचपन बेशक अभावों में बीता,
संस्कार मगर हरदम ही जीता।
अपना पेट काट कर हमें पालते,
माता-पिता को देखा हमें चाहते।
उनके बुढ़ापे में बारी अपनी आई,
जी भर सेवा की और दुआ पाई।
आजके नौजवान ये क्या करते हैं,
माँ-बाप को जो बोझ समझते हैं।
इस कदर बचकानी दलील देते हैं,
समय नहीं है कहके मुँह छुपाते हैं।
भूल गए माँ ने वह पीड़ा सही थी,
सह न सका आज तक नर कभी।
गीले में सोई उसे सूखे में सुलाया,
भूखी रह कर उसे सदा खिलाया।
आज उपेक्षित पड़ी है एक कोने में,
दिन कटता है सिसकने में रोने में।
सिखाया था चलना, खाना, बोलना,
पिता के बस में नहीं मुँह खोलना।
नराधम को नहीं पता क्या खोया है,
‘व्याकुल’ वही तो पाएगा जो बोया है।

बुढ़ापा एक बदनसीबी

बुढ़ापा एक बदनसीबी
-          विनोद शर्मा ‘व्याकुल’
चंचल बचपन और अल्हड़ जवानी
कब कैसे गुजर गए कुछ याद नहीं,
खप गई अधेड़ावस्था घर चलाने में।
लगा दिन रात पाई पाई जुटाने में,
पैर हमेशा चादर से बाहर रहते थे।
न खुद का होश था न फुरसत थी,
बच्चे कुछ बन जाएँ ये हसरत थी।
फर्ज तमाम बखूबी निभाए गए थे,
बच्चे भी अच्छे ओहदे पा गए थे।
बुढ़ापा ये नामुराद जब से आया है,
उपेक्षा के बियाबान में दर्द साया है।
उंगली पकड़ चलना सिखाया जिनको,
वही आज उँगली दिखाते हैं मुझको।
कितना कष्ट सहा उनके सुख के लिए,
मेरी तकलीफें बनी बहाना उनके लिए।
पहुँचाया था स्कूल कांधे पर बिठा कर
पटक दिया गया हूँ कोने में उठा कर।
फ्रेम में जड़ी तसवीर बन रह गया हूँ,
पाला था सबको मोहताज बन गया हूँ।
इस बूढ़े की किसी को जरूरत नहीं है,
हाल जानने की उन्हें फुरसत नहीं है।
कबाड़खाने में टूटे फर्नीचर सा पड़ा हूँ,
काँटा बनके सब की नज़र में गड़ा हूँ।
आता है ये बुढ़ापा बदनसीबी बन कर,
जिंदगी हुई मुहाल ‘व्याकुल’ बूढ़ा हो कर।
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